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भारत के संवैधानिक इतिहास में 13वें उपराष्ट्रपति के रूप में सीपी राधाकृष्णन का नाम एक महत्वपूर्ण मोड़ होगा। राष्ट्रपति चुनाव के बाद निर्विरोध निर्वाचित होने वाले राधाकृष्णन राष्ट्रपति और संसद के बीच संतुलन बनाए रखने के साथ राज्यसभा के सभापति का दायित्व भी निभाएंगे। 12 सितंबर, 2025 को राजघाट स्थित राष्ट्रपति भवन के सभागार में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में उन्हें भारत का उपराष्ट्रपति घोषित किया जाएगा।
सीपी राधाकृष्णन का राजनीतिक एवं कूटनीतिक करियर विविध अनुभवों से परिपूर्ण रहा है। 1950 के दशक में भारतीय विदेश सेवा में शामिल होने के बाद उन्होंने कई महत्वपूर्ण राजनयिक पदों पर कार्य किया। युगांडा, श्रीलंका और मोजाम्बिक में राजदूत के रूप में रहते हुए उन्होंने भारत के सामरिक हितों और आर्थिक सहयोग को सुदृढ़ किया। लोकसभा चुनावों में भी उन्होंने तमिलनाडु से सांसद के रूप में जनता का विश्वास पाया। बाद में राज्यसभा में जाने पर राज्यसभा की कार्यवाहक सभापति के रूप में संभाले गए दायित्व ने उन्हें संसद की प्रक्रियाओं की गहरी समझ दी।
संवैधानिक और प्रोटोकॉल सम्बन्धी जिम्मेदारियाँ
उपराष्ट्रपति का संवैधानिक दायित्व मात्र एक वीसीटी की कुर्सी तक सीमित नहीं है; वे संसद के उच्च सदन—राज्यसभा—के सभापति भी होते हैं। इसके तहत उन्हें सदन के संचालन, विधायी एजेंडा निर्धारित करने एवं सदन की गरिमा बनाए रखने का अधिकार प्राप्त होता है। शून्यकालीन सत्रों के दौरान सदस्यों की सक्रियता और प्रश्नकाल की कार्यवाही की गुणवत्ता उपराष्ट्रपति की अध्यक्षता दक्षता पर आधारित होती है।
राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में संवैधानिक रूप से राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करना, आपात स्थिति में राष्ट्रपति पद की जिम्मेदारी अस्थायी रूप से संभालना और सर्वसम्मति से संविधान संशोधनों पर सहमति प्रदान करना उनकी संवैधानिक भूमिका में शामिल है। परंपरागत रूप से उपराष्ट्रपति की शिष्टाचार यात्रा में विदेशी गणमान्य व्यक्तियों का अभिवादन, संयुक्त राष्ट्र महासभा जैसी अंतरराष्ट्रीय बैठकों में भारत की स्थिति प्रस्तुत करना शामिल रहता है।

सीपी राधाकृष्णन की नेतृत्व शैली और दृष्टिकोण
राजनीति में युवाओं एवं विपक्षी दलों के साथ संवाद स्थापित करने की क्षमता राधाकृष्णन की प्रमुख विशेषता रही है। उन्होंने संसद के भीतर न केवल बहसों को नियंत्रित किया बल्कि सदस्यों के बीच सद्भावना बनाए रखने के लिए कई पारदर्शी पहल की। सांसदों के लिए निरंतर प्रशिक्षण कार्यक्रम, डिजिटल संसाधनों के माध्यम से विधेयक पटल उपलब्ध कराना और एसेंबली कमेटियों की क्रियाशीलता बढ़ाना उनके कार्यकाल के विशेष पहलू रहे।
कूटनीति में उनकी ठोस पकड़ और संकट प्रबंधन कौशल ने देश को अंतरराष्ट्रीय मामलों में सक्रिय भूमिका निभाने का अवसर दिया। उन्होंने सीमा विवाद, सामरिक गठबंधनों और क्षेत्रीय सहयोग को संवेदनशील तरीके से संभाला। उपराष्ट्रपति पद पर अभी भी भारत-अमेरिका, भारत-चीन और भारत-ईयू संबंधों के संवेदनशील दौर में समन्वय राशि की आवश्यकता रहेगी, जिसमें राधाकृष्णन का अनुभव कारगर साबित होगा।
समारोह और आगे की चुनौतियाँ
12 सितंबर को आयोजित होने वाला शपथ ग्रहण समारोह राष्ट्रपति, मंत्रीमंडल के सदस्य, निर्वाचित सांसद, प्रदेश के राज्यपाल और उच्च संविधानिक पदाधिकारियों की उपस्थिति में होगा। समारोह में राष्ट्रीय गान, संविधान की धारा 63 एवं 64 के अनुसार उपराष्ट्रपति के कर्तव्य-पत्र सौंपने की परंपरा पूरी की जाएगी। तत्पश्चात राष्ट्रपति भवन के दीक्षांत कक्ष में सत्कार कार्यक्रम और सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ रहेंगी, जिनमें भारत की विविध संस्कृति का समावेश होगा।
उपराष्ट्रपति के रूप में राधाकृष्णन के समक्ष मुख्य चुनौतियाँ पारदलीय सौहार्द बनाए रखना, राज्यसभा की कार्यवाही को तीव्र और प्रभावी बनाना, तथा संवैधानिक आदर्शों की रक्षा करना होंगी। आर्थिक सुधारों, विधायी प्राथमिकताओं और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों में संतुलन बनाए रखने का जिम्मा उन्हें निभाना होगा। साथ ही वे सदन में ई-वोटिंग, वर्चुअल सत्र और पारदर्शी समिति बैठकों को आगे बढ़ाकर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को सुदृढ़ कर सकते हैं।
नए उपराष्ट्रपति के रूप में उनकी भूमिका भारत की संवैधानिक स्थिरता, लोकतंत्र की रक्षा और वैश्विक मंच पर देश की प्रतिष्ठा को ऊँचाई पर ले जाने में निर्णायक होगी। 12 सितंबर से शुरू होने वाला उनका कार्यकाल राष्ट्र के लिए नए इतिहास के पृष्ठ खोलने का संकेत देगा।
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